October 2, 2022

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सच का आईना

बिहार की राजनीति में “चिराग युग” की शुरुआत? -बिहार राजनीति स्पेशल रिपोर्ट।

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बात बिहार की-क्या चुनाव संभव है?

बिहार विधानसभा चुनाव अक्टूबर-दिसम्बर के बीच में होनी है हालांकि बीते दो हफ्तों के कोरोना संक्रमितों की संख्या को देखकर यह संभव हो पाना मुश्किल लग रहा है। खासतौर पर तब जब स्थानीय लोगों के साथ-साथ मीटिंग करने वाले नेताओं तथा ईवीएम प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान कार्यकर्ताओं में भी तेजी से फैल रहा। इस वक़्त एक हीं चीज सबसे ज़्यादा ज़रूरी है वह टेस्ट की क्षमता बढ़ाई जाए व ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की जाँच हो और संक्रमण चेन बनने से रोका जाए। हालांकि जदयू-भाजपा-लोजपा-राजद-कांग्रेस सभी खेमों में चुनावी रणनीतियों पर तैयारी की पहल शुरू की जा चुकी। आईये एक नज़र डालते है बिहार के जमीनी हालात पर अगर चुनाव तय समय पर हुए जो समीकरण क्या हो सकते हैं।

“सुशासन बाबू का चुनावी मुद्दा”

नीतीश कुमार जब पहली बार चुनावी दौरा कर रहें थे तो उन्होंने नारा दिया था “बिहारी अस्मिता का” जिसके दम पर लालू यादव को हरा सत्ता में आए। दूसरी पाली की शुरुआत सुशासन बाबू के नाम से किया और तुलना लालू यादव के राज से किया। तीसरे चुनावी मुद्दे में उन्होंने ख़ुद को नरेंद्र मोदी के खिलाफ प्रोजेक्ट किया और लालू यादव संग चुनाव जीते। यह चौथी पाली है और इसबार वह भाजपा के साथ है। गौरतलब है कि इस पाँच साल में पहले दो साल गठबंधन बदलने में चलें गये और बाक़ी के तीन साल कुछ काम दिखता नहीं जिसपर वह वोट मांग सके। संभवतः इस बार भी चुनावी मुद्दा लालू यादव के पंद्रह साल बनाम सुशासन के पंद्रह साल पर लड़ा जाए।

“भाजपा और चिराग सुर”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चिराग पासवान के सांसद के कार्यकाल की तारीफ करते है और चिराग पासवान ने भी कभी भाजपा पर निशाना नहीं साधा। यहाँ ग़ौर करने वाली बात है कि चिराग लगातार नीतीश कुमार की खामियों का उल्लेख करते रहें है। एक इंटरव्यू के दौरान सवाल पूछने पर कि क्या चिराग पासवान मुख्यमंत्री बन सकते है जवाब में रामविलास पासवान ने सीधे तौर पर कहा कि बिल्कुल भविष्य में मौका मिले तो दावेदारी ठोकी जा सकती है। वहीं अमित शाह नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर चुके हैं मगर भाजपा जदयू को पूरी छूट नहीं दे सकती इसीलिए चिराग पासवान को फिलहाल पूरा समर्थन दे रही है।

“दूसरा और तीसरा मोर्चा”

मौजूदा हालात में आप किसी भी बिहारी व्यक्ति से बात कीजिये वह दस मिनट में नौ मिनट नीतीश कुमार की शिकायत करेगा, मगर दसवें मिनट कहेगा कि और कोई है भी तो नहीं लायक। दूसरे मोर्चे के नेता तेजस्वी यादव फिलहाल पूरी तरह विफल है जिसके एक यह भी कारण है कि उनकी तुलना उनके पिता लालू प्रसाद यादव से की जाती है और पार्टी व गठबंधन पर भी उतनी पकड़ नहीं है तेजस्वी की। तीसरे मोर्चे का सवाल हीं नहीं उठता यहाँ, बिहार में हमेशा कि तरह जातिगत आधार पर वोट पड़ते है और फिलहाल तीसरा मोर्चा बनता दिख भी नहीं रहा है चाहे वह प्रशांत किशोर हो या पुष्पम प्रिया हों या पप्पू यादव हो या नई पार्टीयाँ हो अकेले चुनाव लड़ने से किसी का फायदा होता नहीं दिख रहा।

“भविष्य की नींव है यह चुनाव?”

यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है कि आगे कि विरासत कौन संभालेगा क्योंकि लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान का युग ख़त्म हो गया है। यह चुनाव 2025 की नींव रख रहा जहाँ सबसे बड़े दावेदार चिराग पासवान निकल कर आ रहे हैं जिन्होंने “बात बिहार की” की शुरुआत कर दावेदारी स्पष्ट कर दी है। भाजपा आलाकमान ने भी युवा ब्रिगेड को तैयार करना शुरू किया है जिसमें फिलहाल सबसे आगे नित्यानन्द राय दिख रहें जो अमित शाह के करीबी हैं फिलहाल। राजद को एकजुट होना होगा, वहीं कांग्रेस का हाल भी बुरा है, नए खिलाड़ियों की भर्ती करनी होगी। तीसरे मोर्चे को भी भविष्य की तैयार करने का अच्छा अवसर मिला है।

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